पुखराज

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धनु लग्न के शुभ रत्न पुखराज प्राय: पीले सफेद रंगों में पाया जाता है। ज्योतिषियों की मान्यता है कि अगर किसी कन्या के विवाह में देरी हो रही हो या रिश्ता तय होने के बाद टूट जाता हो तो ऐसी कन्याओं को वीरवार के दिन सूर्योदय उपरांत पुखराज का पूजन पाठ कराकर इसे सोने की अंगूठी में जड़वाकर पहनना चाहिए क्योंकि पुखराज धारण करने से बृहस्पति दोष दूर हो जाता है। पुखराज गुरु की निम्र दशाओं में अत्यंत लाभकारी माना गया है 

  1. पुनर्वसु पूर्ण भाद्रपद या विशाखा नक्षत्र में जन्मे बालक के लिए।
  2. जन्म कुंडली के पांचवें, छठे या बारहवें घर में यदि गुरु बैठा हो।
  3. जिनकी राशि कर्क, धनु अथवा मीन हो।
  4. बृहस्पति की महादशा में जब अनिष्टकारी फल मिल रहे हों हर तरह की दुर्घटनाओं से भी बचाता है पुखराज।
  5. सूर्य, बृहस्पति, शुक्र का संयुक्त क्रम हो।
  6. सूर्य व शनि के साथ यदि बृहस्पति हो।
  7. प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम, अष्टम व दशम, एकादश राशियों पर स्थित बृहस्पति नुक्सानप्रद फल देता है।

अत: ऐसी स्थिति में भी पुखराज धारण करना लाभप्रद माना जाता है। ॐ ग्रां ग्री ग्रौ शः गुरुवे नमःपुखराज रत्न के प्रतिनिधित्व कर्ता गुरूदेव हैं। संस्कृत में इसे पितस्फटिक, हिन्दी में पुखराज अंग्रेजी में इसे टोपाज कहते हैं।
जब किसी व्यक्ति की जन्म कुण्डली या वर्ण कुण्डली गुरू शुभप्रद नहीं हो तो शुक्लपक्ष के गुरूवार को शुभ मुहूर्त में गुरू के बीज मंत्र 19000 बार जाप करना चाहिए।
गुरू का बीज मंत्र ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवै नमः
गुरू के निमित्त दान वस्तुएं पीला चावल, पुखराज, चने की दाल हल्दी, पीले फूल, बेसन के लड्डू, केला, पीला वस्त्र व घोड़ा, लवण, शक्कर, मिठाई दक्षिणा।

गुरू शांति हेतु उपाय  यदि गुरू अनिष्ट कारक व अशुभ फल दे रहा हो तो
तर्जनी अंगुली में स्वर्ण या चांदी की अंगुठी में पुखाज धारण करें।
केसर का तिलक व केसर की पुडि़या जेब में रखें।
पुष्य नक्षत्र में केले की जड़ सीधे हाथ में धारण करें।
पुखराज परीक्षण विधि पुखराज चिकना, हाथ में लेने पर भारीपन पारदर्शी, कसौटी पर घिसने से चमक में वृद्धि, चौबीसघंटे दूध में रखने पर अंदर नहीं हो, तो पुखराज असली व शुद्ध माना जाता है।

पुखराज धारण विधि
पुखराज 3, 5, 7, 9 या 12 रत्ती का सोने की अंगूठी में जड़वाकर गुरू पुष्य योग या शुक्ल पक्ष में गुरूवार या पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, नक्षत्र में धारण करें। पुखराज की जगह इसका उपरत्न सुनैला भी पुखराज की तरह धारण किया जा सकता है। भगवान गुरू के पूजा  गऊ के लिए चारा डालें व गुरू के निमित्त दान करें।
पुखराज धारण करने के लाभ 

पुखराज धारण करने से प्रेत बाधा व स्त्री सुख में आई बाधा दूर होती है। चिकित्सा शास्त्र में शहद या केवड़ा के साथ पुखराज की भस्म देने से तिल्ली, पाण्डुरोग, खाँसी, दंतरोग, पीलिया, बवासीर, मंदाग्नि, पित्त ज्वर आदि में लाभदायक होता है।

विशेष- पुखराज धारण करना मेष, धनु, मीन, कर्क, वृश्चिक राशि वालों को लाभप्रद रहता है। यदि किसी विषैले कीड़े ने काट लिया हो तो पुखराज घिस के लगाने से विष उतर जाता है।
ॐ वृषभध्वजाय विद्महे करुनीहस्ताय धीमहि ! तन्नो गुरु: प्रचोदयात !
ॐ अन्गीरसाय विद्महे दंडायुधाय धीमहि !तन्नो जीव: प्रचोदयात !
ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि ! तन्नो गुरु: प्रचोदयात
बीजमंत्र-॥ॐ बृं बृहस्पतये नम:॥ जाप संख्या- 19000 कलिकाल 76000

गुरु मंत्र

ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।

नवग्रह मंत्र और जप संख्या इस प्रकार से हैं 
बृहस्पति  ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नमः
जप संख्या  19000
जप समय  प्रात: काल

बृहस्पति स्तुति
जयति जयति जय श्री गुरू देवा। करौं सदा तुम्हारो प्रभु सेवा।
देवाचार्य देव गुरू ज्ञानी। इन्द्र पुरोहित विद्या दानी।।
वाचस्पति वागीश उदारा। जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा।।
विद्या सिन्धु अंगिरा नामा। करहु सकल विधि पूरण कामा।।


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